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Old 31st May 2012
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Talking Astrological Remedies and Solutions to bad planetary effects

ज्योतिषConclusion :
In the foregoing, you may note that :
  • Stars and planets are not the masters of our final destiny. They causeour potential destiny only. An astrologer, however experienced he may be, he can predict only up to the level of potential destiny.
  • It would be useful for us to know the potential destiny. Once we know the potential destiny, we can have a better and objective plan for effective use of wisdom and free will.
  • We are required to use wisdom and free will more objectively to get desired destiny.
  • Do good deeds and reap the fruits in the form of Grace of Creator. Accordingly, get your final destiny as per requirement.
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Last edited by desiamit : 26th November 2012 at 10:18 PM.

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  #2  
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Quote:
सूर्य रत्न माणक (RUBY)
संस्कृत में इसे माणिक्य, पघमराग, हिन्दी में माणक, मानिक, अंग्रेजी में रूबी कहते है! सूर्य रत्न होने से इस ग्रह का अधिष्ठाता सूर्यदेव है!
Quote:
पहचान विधि :
असली माणिक्य लाल सुर्ख वर्ण का पारदर्शी, स्निग्ध- कान्तियुक्त और कुछ भरोपन वजन लिए होते है! अर्थात हथेली में रखने से हल्की ऊष्णता एवं सामान्य से कुछ अधिक वजन का अनुभव होता है! (2) कांच के पात्र में रखने से इसकी हल्की लाल किरणे चरों ओर से निकलती दिखाई देंगी! (3) गाय के दूध में असली माणिक्य रखा जाए तो दूध का रंग गुलाबी दिखलाई देगा!
धारण विधि : माणिक्य रत्न रविवार को सूर्य की होरा में, कृतिका, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाडा नक्षत्रों, रविपुष्प योग में सोने अथवा तांबे की अंगूठी में जड़वाकर तथा सूर्य के बीजमंत्रो द्वारा अंगूठी अभिमंत्रित करके अनामिका अंगुली में धारण करना चाहिए! इसका वजन 3,5,7 अथवा 9 रत्ति के क्रम से होना चाहिए!
सुर्य बीज मन्त्र ओं ह्रां ह्रीं ह्रों स्: सूर्याय नम:!
धारण करने के पश्चात गायत्री मन्त्र की 3 माला का पाठ, हवल एवं सूर्य भगवान को विधिपूर्वक अघ्र्य प्रदान करना तथा ताम्र बर्तन, कनक, नारियल, मानक, गुड, लाल वस्त्रादि सूर्य से सम्बन्धित वस्तुओं का दान करना चाहिए!
विधिपूर्वक माणिक्य धारण करने से राजकीय क्षेत्रों में प्रतिष्ठा, भाग्योंन्ति, पुत्र सन्तान लाभ, तेजबल में वृद्धिकारक तथा हृदय रोग चक्षुरोगक, रक्त विकार, शरीर दौर्बल्यादी में लाभकारी होता है!
मेष, कर्क, सिंह, तुला, वृश्चिक एवं धनु राशि अथवा इसी लग्न वालो को मानक धारण करना शुभ लाभप्रद रहता अथवा जिनकी चन्द्र कुण्डली में सूर्य योगकारक होता हुआ भी प्रभावी न रहा हो, उन्हें भी माणिक्य धारण शुभ रहता है!
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  #3  
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Quote:
चन्द्र-रत्न मोती (PEARL)
चन्द्र-रत्न मोती को संस्कृत में मौक्तिक, चंद्रमणि इत्यादि, हिन्दी-पंजाबी में मोती एवं अंग्रेजी में पर्ल कहा जाता है! मोती या मुकता रत्न का स्वामी चन्द्रमा है!
Quote:
पहचान :
शुद्ध एवं श्रेष्ट मोती गोल, श्वेत, उज्ज्वल, चिकना, चन्द्रमा के समान कान्तियुक्त, निर्मल एवं हल्कापन लिए होता है!
परीक्षा : (1) गोमूत्र को किसी मिटटी के बर्तन में डालकर उसमे मोती रात भर रखें, यदि वह अखण्डित रहे तो मोती को शुद्ध (सुच्चा) समझें! (2) पानी से भरे शीशे के गिलास में मोती डाल दें यदि पानी से किरणों सी निकलती दिखलाई पड़े, तो मोती असली जाने! सुच्चा मोती के आभाव में चंद्रकांत मणि अथवा सफेद पुखराज धारण किया जा सकता है!
असली शुद्ध मोती धारण करने से मानसिक शक्ति का विकास, शारीरिक सौन्दर्य की वृद्धि, स्त्री एवं धनादि सुखों की प्राप्ति होती है! इसका प्रयोग स्मरण शक्ति में भी वृद्धिकारक होता है!
रोग शान्ति-चिकित्सा शास्त्र में भी मोती या मुक्ता भस्म का उपयोग मानसिक रोगों, मुरछा-मिरगी, उन्माद, रक्तचाप, उदर-विकार, पथरी, दन्तरोगादि में!
धारण विधि : मोती चांदी की अंगूठी में शुक्ल पक्ष के सोमवार के पूर्णिमा के दिन, चन्द्रमा की होरा में गंगा जल, कच्चा दूध व पांडूलादी में डुबोते हुए ‘ओं श्रां श्रीं श्रों स: चंद्र्मसे नम:’ के बीजमंत्र का पाठ 11000 की संख्या में करने के पश्चात् धारण करना चाहिए तदुपरांत चावल, चीनी, क्षीर, श्वेत फल एवं वस्त्रादि का दान करना शुभ होगा!
मोती 2,4,6 अथवा 11 रति का अनामिका या कनिष्ठका अंगुली में हस्त, रोहिणी अथवा श्रवण नक्षत्र में सुयोग्य ज्योतिषी द्वारा बताए गए मुहूर्त में धारण करना चाहिए! मेष, वृष, मिथुन, कर्क, कन्या, तुला, वृश्चिक, मीन राशि/लग्न वालों को मोती शुभ रहता है!
चन्द्रमा का उपरत्न-चंद्रकांत मणि (Moon Light Stone) यह उपरत्न चांदनी जैसे चमक लिए हुए चन्द्रमा का उपरत्न (मोती का पूरक) माना जाता है! इसको हिलाने से, इस पर एक दुधिया जैसी प्रकाश रेखा चमकती है! यह रत्न भी मानसिक शान्ति, प्रेरणा स्मरण शक्ति में वृद्धि तथा प्रेम में सफलता प्रदान करता है! लाभी की दृष्टि से चन्द्रकान्त मणि मलाई के रंग का (सफेद और पीले के बचे का) उत्तम माना जाता है! इसे चांदी में ही धारण करना चाहिए!
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मंगल – रत्न मूंगा (CORAL)
इसे संस्कृत में अंगारकमणि तथा अंग्रेजी में कोरल कहते है!
गोल, चिकना, चमकदार एवं ओसत से अधिक वजनी, सिन्धुरी से मिलते-जुलते रंग का मूंगा श्रेष्ट माना जाता है! इसका स्वामी ग्रह मंगल है!
परीक्षा : (1) असली मूंगे को खून में दाल दिया जाये तो उसके चारो ओर गाढ़ा रक्त जमा होने लगता है! (2) असली मूंगा यदि गौ के दूध में दाल दिया जाए तो उसमे लाल रंग की झाई से दिखने लगती है!
श्रेष्ट जाति का मूंगा धारण करने से भूमि, पुत्र एवं भात्रि सुख, निरोगता आदि की प्राप्ति होती है! इसके अतिरिक्त रक्त-विकार, भूत-प्रेत बाधा, दुर्बलता, मन्दाग्नि, हृदय रोग, वायु-कफादि विकार, पेट विकारादि में मूंग की भस्म अथवा मिटटी का प्रयोग किया जाता है! मेष, कर्क, सिंह, तुला, वृश्चिक, मकर, कुम्भ व मीन राशि एवं लग्न वालो को सुयोग्य ज्योतिषी के परामर्शानुसार धारण करना लाभप्रदा होगा!
धारण विधि – शुक्ल पक्ष के मंगलवार को प्रात: मंगल की होरा में मृगशिर, चित्रा या घनिष्ठा नक्षत्र में सोने या तांबे के अंगूठी में जड़ाकर, बीज मन्त्र द्वारा अभिमन्त्रित करके अनामिका अंगुली में 6,8,10 या 12 रत्ति के वजन में धारण करना कल्याणकारी होता है! धारणोंप्रान्त मंगल स्तोत्र एवं मंगल ग्रह का दान करना शुभ होता है!
भौम बीज मन्त्र : ऊं क्रां, क्रीं, क्रों स: भौमाय नम: !
शारीरिक स्वास्थ्य एवं कुं में मंगल नीच राशिस्थ हो तो सफेद मूंगा भी धारण किया जाता है!
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बुध रत्न पन्ना (EMERALD)
पन्ना बुध ग्रह का मुख्य रत्न है! संस्कृत में मरकतमणि, फारसी मेजमरुद व अंग्रेजी में इमराल्ड (Emerald)! पन्ना रत्न हरे रंग, स्वच्छ, पारदर्शी कोमल, चिकना व चमकदार होता है!
Quote:
परीक्षा :
(1) शीशे के गिलास में साफ पानी और पन्ना डाल दिया जाए तो हरी किरणे निकलती दिखाई देगी! (2) शुद्ध पन्ने को हाथ में लेने पर वह हल्का, कोमल व आँखों को शीतलता प्रदान करता है!
गुण:
पन्ना धारण करने से बुद्धि तीव्र एवं स्मरण शक्ति बढती है! विद्या, बुद्धि, धन एवं व्यापार में वृद्धि के लिए लाभप्रद माना जाता है! पन्ना सुख एवं आरोग्यकारक भी है! यह रत्न जादू-टोने, रक्त विकार, पथरी, बहुमूत्र, नेत्र रोग, दमा, गुर्दे के विकार, पाण्डु, मानसिक विकलतादि रोगों में लाभकरी माना जाता है!
धारण विधि : यह नग शुक्ल पक्ष के बुधवार को अश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती, प.फा. अथवा पुष्प नक्षत्रों में अथवा बुध को होरा में सोने की अंगूठी में दायें हाथ की कनिष्ठिका (छोटी) अंगुली में बुधवार के बीजमन्त्र से अभिमंत्रित करते हुए धारण करना चाहिए! इसका वजन 3,6,7 रति होना चाहिए!
बुध बीज मन्त्र : ऊं ब्रां ब्रीं ब्रों स: बुधाय नम: !
वृष, मिथुन, सिंह, कन्या, मकर व मीन राशि वालों को विशेष लाभप्रद रहता है!
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गुरु रत्न पुखराज (TOPAZ)
पुखराज गुरु (बृहस्पति) ग्रह का मुख्य रत्न है! संस्कृत में इसे पुष्प राजा, हिन्दी में पुखराज व अंग्रेजी में टोपाज कहते है!
Quote:
पहचान विधि :
जो पुखराज स्पर्श में चिकना, हाथ में लेने पर कुछ भारी लगे, पारदर्शी, प्राकृतिक चमक से युक्त हो वह उत्तम कोटि का माना जाता है!
परीक्षा : (1) जंहा किसी विषैले कीड़े ने काटा हो, वंहा पर असली पुखराज घिस कर लगाने से विष उतर जाता है! (2) चौबीस घन्टे कच्चे दूध में रखने के बाद यदि चमक में अन्तर न पड़े तो पुखराज असली होगा! इत्यादि!
गुण : पुखराज धारण करने से बल, बुद्धि, स्वास्थ्य एवं आयु की वृद्धि होती है! वैवाहिक सुख, पुत्र सन्तान कारक एवं धर्म-कर्म में प्रेरक होता है! प्रेत-बाधा का निवारण एवं स्त्री के विवाहसुख की बाधा को दूर करने में सहायक होता है!
औषधि प्रयोग : इसको वैध के परामर्शानुसार केवडा एवं शहदादि के साथ देने से पीलिया, तिल्ली, पांडू रोग, खांसी, दन्त रोग, मुख की दुर्गन्ध, बवासीर, मन्दाग्नि, पित्त-ज्वरादि में लाभदायक होता है!
धारण विधि : पुखराज रत्न 3,5,7,9 या 12 रति के वजन का सोन की अंगूठी में जड़वाकर तर्जनी अंगुली में धारण करें, सुवर्ण या ताम्र बर्तन में कच्चा दूध, गंगा जल, पीले पुष्पों से एवं ऊं ऐ क्लीं बृह्स्पतये नम:’ के बीच मन्त्र द्वारा अभिमंत्रित करके धारण करना चाहिए! मन्त्र संख्या 19 हजार!
यह नग शुक्ल पक्ष के गुरुवार की होरा में, अथवा गुरुपुष्य योग में या पुनर्वसु, विशाखा, पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में धारण करना चाहिए!
पुखराज धनु, मीन, राशि के अतिरिक्त मेष, कर्क, वृश्चिक राशि वालो को लाभप्रद रहता है! धारण करने के पश्चात गुरु से सम्बन्धित वस्तुओं का दान करना शुभ होता है!
गुरु का उपरत्न सुनैला : इसे पुखराज का उपरत्न माना जाता है! पुखराज मूल्यवान होने के कारण सुनैला को उसके पूरक के रूप में धारण किया जा सकता है! श्रेष्ठ सुनैला हल्के पीले रंग ( सरसों के जैसा पीलापन) का होता है! कई बार पुखराज से अधिक पीलापन लिए होता है तथा आंशिक मात्रा में पुखराज के समान ही उपयोगी होता है! धारण विधि पुखराज के समान ही होगी!
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शुक्र रत्न हीरा (DIAMOND)

शुक्र ग्रह का मुख्य प्रतिनिधित्व हीरा है!
संस्कृत में इसे वज्रमणि, हिन्दी में हीरा तथा अंग्रेजी में डायमंड कहते है!
हीरा अत्यंत चमकदार प्राय: श्वेत वर्ण का होता है!
पहचान : अत्यंत चमकदार, चिकना, कठोर, पारदर्शी एवं किरणों से युक्त हीरा असली होता है!
परीक्षा : (1) धूप में यदि हीरा रख दिया जाये तो उसमे से इन्द्रधनुष जैसी किरणे दिखाई देती है! (2) तोतले बच्चे के मुंह में रखने से बच्चा ठीक से बोलने लगता है! (3) अंधेरे में जुगनू कई भांति चमकता है!
गुण : हीरे में वशीकरण करने की विशेष शक्ति होती है! इसके पहनने से वंश- वृद्धि, धन- लक्ष्मी व सम्पति की वृद्धि, स्त्री एवं सन्तान सुख की प्राप्ति व स्वास्थ्य में लाभ होता है! वैवाहिक सुख में भी वृद्धिकारक माना जाता है!
औषधीय गुण : हीरे की भस्म, शहद-मलाई आदि के साथ ग्रहण करने से अनेक रोगों में लाभ होता है! जैसे-दौर्बलयता, नंपुसकता, वायु प्रकोप, मन्दाग्नि, वीर्य विकार, प्रमेह दोष, हृदय रोग, श्वेत प्रदर, विषैला व्रण, बच्चो में सुखा रोग, मानसिक कमजोरी इत्यादि!
धारण विधि : शुक्ल पक्ष के शुक्रवार वाले दिन, शुक्र की होरा में, भरणी, पुष्य, पुर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढा नक्षत्र, एक रत्ती या इससे अधिक वजन का हीरा सोने की अंगूठी में जडवा कर के बीज मन्त्र ( ऊं द्रां, द्रीं द्रों स्: शुक्राय नमJ का 16 हजार की संख्या में जाप करके शुभ मुहूर्त में धारण करना चहिए! हीरा मध्यमा अंगुली में धारण करना चाहिए! धारण करने के दिन शुक्र ग्रह से सम्बन्धित वस्तुएं जैसे दूध, चांदी, दही, मिश्री, चावल, श्वेत वस्त्र, चन्दनादि का दान यथाशक्ति करना चाहिए!
हीरा (धारण करने की तिथि से) सात वर्ष पर्यन्त प्रभवकारी बना रहता है! हरा वृष, मिथुन, कन्या, तुला, मकर, कुम्भ राशि वालों को लाभदायक रहता है!
शुक्र के उपरत्न (1) फिरोजा : नीले आकाशीय रंग जैसा यह नग शुक्र का उपरत्न माना गया है! यह रत्न भूत, प्रेत, दैवी आपदा तथा आने वाले कष्टों से धारक की रक्षा करता है! यदि इस रत्न को कोई भेंटस्वरूप प्राप्त करके पहनेगा तो अधिक प्रभावशाली रहेगा! हल्के प्रखर चमकदार रंग वाला रत्न उत्तम होता है! कोई भी कष्ट या रोग आने से पहले यह रत्न अपना रंग बदल लेता है! नेत्र रोग, सौन्दर्य, सिर दर्द, विषादि रोगों में विशेष लाभकारी रहता है!
(2) ओपल : यह भी शुक्र का एनी उपरत्न है! इसको धारण करने से सदाचार, सदचिन्तन तथा धार्मिक कार्यों की ओर रूचि रहती है! अधिक लोकप्रिय नहीं है! इसके अतिरिक्त शुक्र के अन्य भी बहुत से उपरत्न प्रचलित है!
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शनि रत्न नीलम (SAPHIRE)
नीलम शनिग्रह का मुख्य रत्न है! हिन्दी में नीलम तथा अंग्रेजी में सैफायर कहते है!
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पहचान :
असली नीलम चमकीला, चिकना, मोरपंख के समान वर्ण जैसा, नीला लगता है! (2) पानी से भरे कांच के गिलास में डाला जाए नीली किरणे दिखाई देंगी! (3) सूर्य की धूप में रखने से नीले रंग की किरणे दिखाई देंगी!
गुण : नीलम धारण करने से धन-धान्य, यश-कीर्ति, बुद्धि चातुर्य, सर्विस एवं व्यवसाय तथा वंश में वृद्धि होती है! स्वास्थ्य सुख का लाभ होता है!
ध्यान रहे, बहुधा नीलम चौबीस घंटे के भीतर ही प्रभाव करना शुरू कर केता है! यदि नीलम अनुकूलन न बैठे तो भारी नुकसान की आंशका हो जाती है! अतएव परीक्षा के तौर पर कम से कम 3 दिन तक पास रखने पर यदि बुरे स्वप्न आएं, रोग उत्पन्न हो या चेहरे की बनावट में अन्तर आ जाए तो नीलम मत पहने!
रोग शान्ति : नीलम धारण करने या औषधि रूप में ग्रहण करने से दमा, क्षय, कुष्ठ रोग, हृदय रोग, अजीर्ण, मूत्राशय सम्बन्ध रोगों में लाभकारी है!
धारण विधि : नीलम 5,7,9,12 अथवा अधिक रत्ति के वजन का, पंचधातु, लोहे अथवा सोने की अंगूठी में शनिवार को शनि की होरा में एवं पुष्य, उभा, चित्रा, स्वा, धनि या शतभिषा नक्षत्रो में शनि के बीज मन्त्र ऊं प्रा प्रीं प्रों स: शनये नम: मन्त्र से 13000 की संख्या में अभिमंत्रित करके धारण करे! तत्पश्चात शनि की वस्तुओं का दान दक्षिणा सहित करना कल्याणकारी होगा!
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[My story] Sarfarosh
पोंछ कर अश्क़ अपनी आँखों से, मुस्कुराओ तो कोई बात बने ! सर झुकाने से कुछ नहीं होगा, सर उठाओ तो कोई बात बने !!
भेदभाव अपने दिल से, साफ़ कर सके| दोस्तों से भूल हो तो, माफ़ कर सकें|| हम को मन की शक्ति देना, मन विजय करें| दूसरों की जय से पहले, खुद को जय करें ||
खुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी वा की धार। जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार।। A drop of honey catches more flies than a gallon of gall. ~ Lincoln

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राहु रत्न गोमेद (ZIRCON)
राहु रत्न गोमेद को संस्कृत में गोमेदक, अंग्रेजी झिरकन कहते है! गोमेद करंग गोमूत्र के समान हल्के पीले रंग का, कुछ लालिमा तथा श्यामवर्ण होता है! स्वच्छ, भारी, चिकना गोमेद उत्तम होता है तथा उसमे शहद के रंग की झाई भी दिखाई देती है!
पहचान विधि: सामान्यत: गोमेद उल्लू अथवा बाज की आँख के समान होता है तथा गोमूत्र के समान, दल रहित अर्थात जो परतदार न हों, ऐसे गोमेद उत्तम होंगे! (1) शुद्ध गोमेद को 24 घण्टे तक गोमूत्र में रखने से गोमूत्र का रंग बदल जायेगा!
धारण विधि : गोमेद रत्न शनिवार को शनि की होरा में, स्वाती, शतभिषा, आर्द्रा अथवा रविपुष्य योग में पांचधातु अथवा लोही के अंगूठी में जड़वाकर तथा राहु में बीज मन्त्रो द्वारा अंगूठी अभिमंत्रित करके दाएं हाथ की मध्यमा अंगुली में धारण करना चाहिए! इसका वजन 5,7,9 रती का होना चाहिए!
राहु बीज मन्त्र : ऊं भ्रा भ्री भ्रों स: राहवे नम:!
धारण करने के पश्चात बीज मन्त्र का पाठ हवन एवं सूर्य भगमान को अघ्र्य प्रदान कर नीले रंग का वस्त्र, कम्बल, तिल, बाजरा आदि दक्षिणा सहित दान करें!
विधिपूर्वक गोमेद धारण करने से अनेक प्रकार की बीमारियाँ नष्ट होती है, धन- सम्पति – सुख, सन्तान वृद्धि, वकालत व राजपक्ष आदि की उन्नति के लिए अत्यन्त लाभकारी है! शत्रु-नाश हेतु भी इसका प्रयोग प्रभावी रहता है!
जिनकी जन्म कुण्डली में राहु 1,4,7,9,10वें भाव में हो, उन्हें गोमेद रत्न पहनना चहिए! मकर लग्न वालो के लिए गोमेद शुभ होता है!






राहु का प्रभावी उपाय :

नवग्रहों में यह अकेला ही ऐसा ग्रह है जो मायावी ग्रह के नाम से जाना जाता है। सबसे कम समय में किसी व्यक्ति को करोड़पति, अरबपति या फिर कंगाल बना सकता है। जब राहु व्यक्ति को विपरीत परिणाम देता है तो लगता है जैसे की विपत्तियों का परिणाम टूट पड़ा। ऐसा व्यक्ति शारीरिक, मानसिक तथा आर्थिक रूप से पूरी तरह टूट सा जाता है। कुंडली के सारे राजयोग अचानक से राहु के आगे बौने नज़र आने लगते हैं। आदमी किंकर्तव्य विमूढ़ की तरह हो जाता है। ऐसा व्यक्ति अनेक ज्योतिषी, पण्डित आदि लोगों के पास जाने लगता है। बहुत सारे उपाय, पूजा-पाठ शुरू करता है जिनका असर तो होता है परन्तु छणिक। ऐसे व्यक्ति के लिए में यहाँ एक उपाय लिख रहा हूँ। मैंने यह खुद आजमाने के बाद अक्षरसः सत्य पाया।


राहु का प्रभावी उपाय :

नवग्रहों में यह अकेला ही ऐसा ग्रह है जो मायावी ग्रह के नाम से जाना जाता है। सबसे कम समय में किसी व्यक्ति को करोड़पति, अरबपति या फिर कंगाल बना सकता है। जब राहु व्यक्ति को विपरीत परिणाम देता है तो लगता है जैसे की विपत्तियों का परिणाम टूट पड़ा। ऐसा व्यक्ति शारीरिक, मानसिक तथा आर्थिक रूप से पूरी तरह टूट सा जाता है। कुंडली के सारे राजयोग अचानक से राहु के आगे बौने नज़र आने लगते हैं। आदमी किंकर्तव्य विमूढ़ की तरह हो जाता है। ऐसा व्यक्ति अनेक ज्योतिषी, पण्डित आदि लोगों के पास जाने लगता है। बहुत सारे उपाय, पूजा-पाठ शुरू करता है जिनका असर तो होता है परन्तु छणिक। ऐसे व्यक्ति के लिए में यहाँ एक उपाय लिख रहा हूँ। मैंने यह खुद आजमाने के बाद अक्षरसः सत्य पाया।हमारा भारतीय कैलेण्डर हमारे आत्मगौरव की भावना को दर्शाता है। चन्द्रमा हमारी पृथ्वी के चक्कर लगाता है। चन्द्रमा द्वारा पृथ्वी का एक चक्कर लगा लेने की अवधि को ‘चन्द्र माह’ कहा जाता है ऐसे बारह माह मिलाकर हमारा कैलेण्डर बना है। यह माह है-चैत्र, वैशाख, ज्यैष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भादों, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीष, पौष, माघ और फाल्गुन। प्रति तीसरे वर्ष एक माह की गिनती दोबारा कर, हम पृथ्वी द्वारा सूर्य का चक्कर लगा लेने की अवधि से भी तालमेल बैठा लेते है।
अंग्रेजी कैलेण्डर के मार्च-अप्रैल में चैत्र माह पड़ता है। यह माह अग्न्याशय (पैनक्रियाज) नामक ग्रन्थि को विशेष रूप से प्रभावित करता है। इसी ग्रन्थि में ’इंसुलिन’ नामक हारमोन बनता है। यह हारमोन खाद्य पदार्थों के शर्करा अंश को ऊर्जा और सजगता में परिवर्तित करता है।चैत्र माह (मार्च-अप्रैल) में अग्न्याशय ग्रन्थि निष्क्रिय होकर विश्राम अवस्था में रहती है। अतः गन्ना, गुड़, शक्कर, आदि अति मीठे पदार्थो का विधिवत् पाचन नहीं हो पाता। जो व्यक्ति हठवश या अज्ञानवश, इस माह में मीठी वस्तुओं का प्रयोग अति कम या बन्द नहीं करता, वह आगे चलकर, मधुमेह नामक प्राणघाती रोग का शिकार हो जाता है। बाकी के महीनों में भोजन के बाद एक डली गुड़ खाना स्वास्थ तथा पाचन-क्रिया के लिए ज्यादती होता है।
वैशाख माह (अप्रैल-मई)-में ग्रीष्म ऋतु तीव्रता ग्रहण करती है। शरीर में एकत्रित चर्बी इन्हीं दिनों पिघलती है। अतःतैलीय
पदार्थ, यहां तक कि तिल, मूगंफली आदि भी खाना शरीर के साथ ज्यादती होता है।
ज्येष्ठ माह (मई-जून)- भीषण गरमी की तपन वाला होता है। इस माह में घी, मलाई, मक्खन, आदि स्निग्ध, पदार्थ वर्जित हैं। यहां तक कि सिर व शरीर पर तेल-मालिश करना भी मना किया गया है।
बेल नामक फल गरमी में पकता है। इसका शर्बत पीना शरीर को शीतलता प्रदान करता है, परन्तु आषाढ़ मास (जून-जुलाई) में इस फल के उपयोग का शरीर पर घातक प्रभाव होता है।
श्रावण (जुलाई-अगस्त) माह में अच्छी वर्षा होती है। गरम और गीली जलवायु के करण कीट-पतंगों का प्रजनन तीव्रता से होता है। अनेक अदृश्य कीटाणु पŸाों फलों और सब्जियों में ही शरण लेते हैं। अतः इस महीने में पŸोदार व हरी सब्जियों का उपयोग कदापि न करें, अन्यथा रक्त-विषाक्तता तथा चर्म रोगों से बचाव असम्भव होगा ।
भादों माह (अगस्त-सितम्बर) में छाछ या दही को न लें। दही भी केवल बारह घण्टे तक जमाया हुआ ही उपयोग करें।
आश्विन माह (अक्टुबर- नवम्बर) धूप-छांव वाला होता है। इस माह अग्नाशय ग्रन्थि के जागने की स्थिति बनती है करेला और मैथी में इंसुलिन हारमोन्स के तत्व होते हैं। अतः इस माह इन्हें न खायें।
कार्तिक माह (अक्टुबर-नवम्बर) शीत ऋतु के आगमन का सन्देश लाता है। वर्षा ऋतु में मन्द हुई पाचन-क्रिया का जागरण होता है। अतः दही के उपयोग से पाचन-क्रिया और पाचक रसों का हानि न पहुंचायें।
मार्गशीष (नवम्बर-दिसम्बर) माह में आंवला और जीरा का उपयोग न करें। कच्चा आंवला विशेष रूप से हानिकर होता है। अन्य महीनों में यही आंवला ‘अमृतफल’ के समान लाभदायी हो जाता है। जीरा पिŸारस को शान्त व निष्प्रभावी बनाता है, जबकि इस मौसम में पाचकाग्नि पूरी शक्ति में होती है।
पौष और माघ (दिसम्बर- जनवरी- फरवरी) भरपूर ठण्ड के महीेने हैं। धनिया व मिश्री शीतल प्रभाव रखते हैं। अतः इस दौरान इनका उपयोग न करें। हिन्दी का अन्तिम महीना फाल्गुन (फरवरी-मार्च) है। यह वसन्त ऋतु की बहार का है। इन्हीं दिनों चना खेतों में फलता है चने की भाजी, चना या हरा चना इस माह में कदापि न खायें। बेसन से बनी वस्तुएं भी न खायें, अन्यथा आंव, दस्त, मुंह में छाले आदि रोग हो सकते हैं।
जो व्यक्ति इन बारह महीनों में वर्जित वस्तुओं का त्याग करेगा, सावधानी और सजगता का परिचय देगा, उसके घर में वैद्य-डाॅक्टर के प्रवेश की आवश्यकता नहीं पडे़गी।
अपनी रूची, प्रकृति और अभ्यास के अनुसार उŸाम खाद्य पदार्थो से आधा पेट ही भरें। शेष आधे पेट का चैथाई भाग वायु के लिए खाली रखें। ऐसा करने पर आप कभी बीमार नहीं पडे़ंगे।
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Last edited by desiamit : 20th April 2016 at 06:01 PM.

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